इन्द्री( विजय काम्बोज):आज समाज में जातपात व धर्म के नाम पर घुल रहे जहर से जहां माहौल नफरती हो रहा है, वहीं उधम सिहं ने जलियावाला बाग में निर्दोष लोगों के खून का बदला लेने के लिए अपना नाम राम मोहम्द सिंह आजाद रखकर सभी धर्मो का सम्मान कर एकता व अखण्डता की मिसाल पेश की। उनके दिखाए रास्ते पर चलते हुए शहीद उधम सिंह समिति के अध्यक्ष एवं नम्बरदार एसोसिएशन विचार मंच के प्रधान मेहर सिंह निर्मल के नेतृत्व में इन्द्री में शहीद उधम सिंह के बलिदान दिवस पर सियासी दलों ने फिर से अनूठा उदारण पेश किया। इस कार्यक्रम में सभी धर्म, जात जमात, राजनीतिक दलों और संगठनों ने हर वर्ष की भांति एक मंच में एकजुट होकर शहीद उधम सिंह को नमन् कर उनके दिखाए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया। समारोह हवन-यज्ञ और पूजन के साथ शुरू हुआ और शहीद की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने के बाद प्रसाद वितरण पर कार्यक्रम का समापन हुआ। हवन-यज्ञ पण्डित राजेश शर्मा ने विधिविधान से कराया।
शहीद उधम सिंह की जीवनी पर गीत की प्रस्तुति से उपस्थितजनों के मन में जोश भर गया।
इस मौके पर बोलते हुए शहीद उधम सिंह समिति के अध्यक्ष नम्बरदार मेहर सिंह निर्मल ने कहा कि इन्द्री में पिछले 21 वर्षो से शहीद उधम सिंह समिति द्वारा शहीद उधम सिहं के जन्मदिवस और बलिदान दिवस समारोहों का लगातार आयोजन किया जा रहा है। सभी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा एक मंच पर आकर शहीद नमन् करते है।
शहीद उधम सिहं समिति के अध्यक्ष एम एस निर्मल ने कहा कि शहीद उधम सिहं का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के सुनाम कस्बे में साधारण किसान सरदार टहल सिहं के घर में हुआ। उधम सिहं के बचपन में मां-बाप का निधन हो गया। जब उधम सिहं ने दसवीं की परीक्षा पास कर जवानी की तरफ कदम रखा तो अंग्रेज हकूमत के गवर्नर माईकल ओयडवायर और जरनल डायर ने बैसाखी के पवित्र त्यौहार मनाने 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में इकटठे हुए निर्दोष लोगों पर गोलियां चलवा खूनी होली खेली। इस खूनी खेल के1800 से अधिक लोग शिकार हुए। इस दृष्य से उधम सिहं का खून खोल उठा तथा वहीं पर खून से सनी मिट्टी को उठकर इस घटना के दोषियों को सजा देने का निर्णय ले लिया। इसके लिए वह इग्ंलैण्ड गए और भरी जनसभा में ही दोनों हत्यारों को मौत के घाट उतारने का इंतजार 21 साल तक अनेक यातनाएं झेलकर करते रहे। आखिरकार वह दिन आ गया जिस की वह इंतजार में तडफ़ रहे थे। जब 13 मार्च 1940 को किग्ंसटन हाल में हो रही एक जनसभा में माइक ओडवायर हिन्दुस्तानियों की हत्या करने की सेखी मार रहे थे तो उधम सिंह ने सरेआम माइक ओडवायर को गोलियों से भूनकर भारतीयों के खून का बदला ले लिया। अंग्रेज हकूमत ने उन पर मुकदमा चलाया और 5 जून को उन्हे फांसी सुना दी गई तथा 31 जुलाई 1940 को उन्हे शहीद कर दिया गया। उधम सिंह चाहते तो मौके से फरार भी हो सकते थे, लेकिन उन्होंने कहा था कि जो प्रतिज्ञा मैंने ली थी उसका बदला लेकर भारतीयों का गौरव बढ़ाने के काम पर कोई पश्चाताप नहीं हैं।
इसी भाव से उन्हें शहीदों में सर्वोच्च स्थान हासिल हुआ। समिति शहीद उधम सिंह की जीवनी पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने तथा उनके नाम पर प्रमुख सार्वजनिक स्थानों के नाम रखने की मांग करती है ताकि उनके जीवन से देशवासियों के मन में आपसी एकता, भाईचारे और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा मिलती रहें। इसके साथ ही शहीद उधम सिंह समिति शहीद उधम सिंह की तरह देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सभी राष्ट्र भक्तों को नमन् करती है।
कार्यक्रम में भाजपा नेता प्रदीप काम्बोज, सुमेर काम्बोज, पण्डित धर्मपाल शांडिल्य, जिला परिषद चेयर पर्सन प्रतिनिधि सोहन राणा, नगरपालिका चेयरमैन राकेश पाल,चेेयरमैन महेन्द्र पंजोखरा, कांग्रेस हलका प्रधान जिला पार्षद सचिन बुढनपुर, रणधीर सातड़ी, कुशल काम्बोज, युजवेंद्र श्योराण जसबीर, मेहमसिंह राजेपुर, करम सिंह कानपुर, मुकेश काम्बोज, प्रिंस धुडिया, तरुण महता , मेघराज पन्नालाल काम्बोज, पूर्ण काम्बोज, डॉ संजय ब्याना, नेता प्रदीप काम्बोज,नवीन काम्बोज, देश राज काम्बोज, नम्बरदार एसोसिएशन विचार मंच के पदाधिकारी, जीतराम राम कश्यप, विक्की मल्होत्रा, मनोज काम्बोज बिट्टू, अशोक काम्बोज, बलजीत राणा, बलबीर काम्बोज, अनिल नन्हेड़ा, कमल काम्बोज खेड़ा, बीरबलपाल नम्बरदार, रोहताष काम्बोज, मेमपाल फाजिलपुर, कृष्ण बंसल,जगमाल मास्टर, रमेश काम्बोज, कंवरपाल, नम्बरदार जगपाल, विजय काम्बोज, सुभाष खेड़ा, मंडी के पूर्व प्रधान शमेसिंह काम्बोज, देवेन्द्र काम्बोज, किरण मुरादगढ़, जयपाल बंसल, आदि श्रद्धासुमन भेंट किए।









