इन्द्री विजय काम्बोज || दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा कमधेनु गोपाल गौशाला,वार्ड नंबर 4, इंद्री में तीन दिवसीय ” सत्संग कार्यक्रम ” का आयोजन किया गया है। जिसके द्वितीय दिवस के अंतर्गत दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री सत्या भारती जी ने* अपने मधुर कंठ से बताया कि प्रभु के जीवन पर आधारित अनेकों ही गौरवशाली ग्रंथ हैं। जिनमे उनकी प्रत्येक लीला के पीछे कोई न कोई आध्यात्मिक रहस्य निहित है। जिसको हम अपनी अल्प बुद्धि के माध्यम से नहीं समझ सकते। आगे उन्होंने बताया कि प्रभु की दिव्य लीलाओं का तत्समय प्रयोजन तो था ही आज वर्षोपरांत भी हमारे लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं। जिससे हमारे जीवन का मार्ग दर्शक हो सके। अतएव प्रभु के जीवन से जुडी यह लीलाएं हमारे लिए खास महत्त्व इसलिए भी रखती हैं क्योंकि उनसे हमारी संस्कृति और लोक व्यवहार जुड़ा हुआ है।
सुश्री सत्या भारती जी ने बताया कि महापुरुषों की लीलाओं को दिव्य लीला क्यों कहते हैं क्योंकि उनकी लीलाएं अलौकिक होती हैं। जिसमें प्रत्येक मानव को कुछ सीखने को मिलता है व उनकी अलौकिक लीलाओं को हम अपनी लौकिक बुद्धि से कैसे समझ सकते हैं? बाह्य इन्द्रियों से तो मानव संसार को ही नहीं देख सकता। जिस प्रकार से सृष्टि में अनेको सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं तथा हमारी पृथ्वी से लाखों मील दूर आकाश में बहुत से ग्रह नक्षत्र पाए जाते हैं जिसे मानव अपनी प्राकृतिक आँखों के द्वारा नहीं देख सकता। उन्हें देखने के लिए भी मानव को सूक्ष्मदर्शी जैसे यंत्र की आवश्यकता पड़ती है। तो फिर ईश्वर जिसे हमारे शास्त्रों में अगोचर की संज्ञा से विभूषित किया उसे भला मानव इन भौतिक आँखों के द्वारा कैसे देख सकता है। उन्होने बताया कि प्रभु की ऐसी दिव्य लीलाओं को हम अपने घट में भी देख सकते हैं। लेकिन इसके लिए दिव्य चक्षु की आवश्यकता है। तभी हम अपने अंतः करण में व्याप्त प्रभु को देख सकते हैं। जिन भक्तों ने ईश्वर के दर्शन किये उनके पास बाहरी नहीं भीतरी आँख भी थी। भक्त सूरदास जी चक्षु हीन थे परन्तु उन्होंने प्रभु की लीलाओं का कैसे व्याख्यान किया। क्योंकि उन्होंने अपने घट में देखा था। हमारे सभी शास्त्र बतातें हैं कि हमें मानव तन ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिए मिला है। इस मानव तन की तुलना नौका के समान की गई है। यदि हमने परमात्मा का दर्शन न किया, उसकी भजन बंदगी न की तो फिर हम भवसागर से पार कैसे हो पाएंगे? कथा को श्रवण करने हेतु उपस्थित भगवत प्रेमी इन आध्यात्मिक रहस्यों को श्रवण कर आश्चर्य से भर उठे। इस अवसर पर श्री तरुण मेहता जी, चंद्र सचदेव जी, कवर सिंह कम्बोज, विक्की कालड़ा जी आदि विशेष तौर पर पहुंचे। साध्वी वनिता भारती और साध्वी देवेंद्र भारती जी ने भी मधुर भजनों का गायन कर भक्तों को भावविभोर कर दिया। तरुण मैहता , चंद्र सचदेवा, कंवर सिंह कम्बोज और विकी कालडा जी का भी सहयोग रहा!









