अंबाला अनिल शर्मा। क्या सरकारी संपत्ति पर ‘चंद’ चेहरों का एकाधिकार हो सकता है? क्या जनता के टैक्स से चलने वाले एसी और बिजली के बिल सिर्फ करीब 16 लोगों की सुविधा के लिए हैं? ये वो तीखे सवाल हैं जिन्होंने बुधवार को जिला डीसी कार्यालय की फिजा में गर्माहट पैदा कर दी।
अंबाला के पत्रकारों के एक बड़े प्रतिनिधिमंडल ने डीसी अजय तोमर से मुलाकात कर सूचना एवं लोक संपर्क अधिकारी (DIPRO) कार्यालय परिसर में बने एक ‘विवादित’ कमरे को लेकर मोर्चा खोल दिया है।
विवाद की जड़: 16 का ‘जादुई’ आंकड़ा
पत्रकारों ने डीसी के सामने तथ्यों की झड़ी लगाते हुए बताया कि 8 साल पहले सरकार ने पत्रकारों के बैठने के लिए एक कमरा मौखिक तौर पर अलॉट किया था। इसके लिए कोई लिखित ऑर्डर जारी नहीं हुई। लेकिन हैरानी की बात यह है कि करीब एक दशक बीत जाने के बाद भी यहाँ सदस्यों की संख्या करीब 16-17 से आगे नहीं बढ़ पाई।
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अघोषित कब्जा: आरोप हैं कि इस सरकारी कमरे पर कुछ लोगों ने निजी संपत्ति की तरह कब्जा कर रखा है।
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तालाबंदी का राज: दफ्तर पर अक्सर ताला लटका रहता है, जिससे आम पत्रकारों का प्रवेश नामुमकिन हो जाता है।
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हिसाब का डर: प्रतिनिधिमंडल का दावा है कि ये ‘खास’ लोग दूसरे साथियों को इसलिए नहीं जोड़ना चाहते क्योंकि उन्हें अपनी ‘कुर्सी’ छिनने और पिछले सालों का ‘हिसाब-किताब’ सार्वजनिक होने का डर है।
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”बिल सरकार का, मौज चंद लोगों की”
पत्रकारों ने दो-टूक शब्दों में कहा कि जब जमीन सरकारी है, भवन सरकारी है और उसका रखरखाव भी सरकारी खजाने से हो रहा है, तो वहां वीवीआईपी कल्चर’ क्यों?
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मांग स्पष्ट है:
या तो इस भवन को जिले के सभी पत्रकारों के लिए सार्वजनिक किया जाए।
या फिर इस अवैध कब्जे को हटाकर सरकारी भवन को खाली करवाया जाए।
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मनमर्जी क्यों
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में ‘चुनिंदा’ लोगों की मनमर्जी नहीं चलेगी। सरकारी संपत्ति किसी की निजी बपौती नहीं हो सकती। प्रतिनिधिमंडल की यही सामूहिक आवाज रही।
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डीसी के आश्वासन के बाद क्या टूटेगा तिलस्म?
मामले की गंभीरता को देखते हुए डीसी अजय तोमर ने पत्रकारों को उचित कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन उन ’16 लोगों’ के रसूख के आगे झुकता है या सरकारी भवन के द्वार सभी कलमकारों के लिए समान रूप से खोलने के आदेश पारित कर लोकतंत्र को बहाल कर आदर्श स्थापित करेंगे।









