हमारे शास्त्र-ग्रंथों में कहा गया— मन तू जोत स्वरूप है-साध्वी यशोदा भारती

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करनाल विजय काम्बोज ||दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से शिव चित्रगुप्त मंदिर, सदर बाज़ार, करनाल में आयोजित साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम में दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी यशोदा भारती जी ने अपने प्रेरणादायक प्रवचनों में बताया कि हम में से प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह एक विद्यार्थी हो या व्यापारी, गृहिणी हो या कर्मचारी, किसी की भी अपने कार्य में एकाग्रता बन ही नहीं पाती। हमारा मन दसों दिशाओं में भटकता रहता है। हम करना कुछ चाहते हैं, लेकिन हमारा मन कहीं और होता है। इस कारण हम चाहकर भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते।
आखिर क्यों एकाग्र नहीं हो पाता हमारा मन? क्यों इतना विचलित हुआ है यह? आइए, एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। एक नदी जब पहाड़ों पर से नीचे उतरती है, तो चट्टानों से टकराती हुई, बहुत शोर मचाती हुई चलती है। कितनी अशांत और विचलित हुई होती है! लेकिन यही नदी जब अपने लक्ष्य, सागर में मिल जाती है तो उसका सारा विक्षोभ और शोर बिल्कुल खत्म हो जाता है। वह पूर्णतः शांत हो जाती है। फिर उसमें कहीं कोई शोर या अशांति नहीं रहती। ठीक ऐसे ही, आज हमारा मन अशांत है, विचलित हुआ है क्योंकि वह अपने स्रोत से अलग है। उसमें विखण्डन हुआ है। जब तक वह अपने स्रोत परमात्मा से नहीं मिल जाता, तब तक वह शांत हो ही नहीं सकता। अपने आधार से जुड़े बिना उसकी एकाग्रता संभव ही नहीं।
तभी तो हमारे शास्त्र-ग्रंथों में कहा गया— मन तू जोत स्वरूप है, अपना मूल पहचान अर्थात् कि मन तू प्रकाश स्वरूप है। तू अपने आधार को पहचान। संत सुकरात कहते हैं—अपने आप (आत्म स्वरूप) को जानो। गुरजिएफ भी अपने विचारों में अक्सर एक शब्द कहा करते थे— अपने भूले हुए आत्मस्वरूप का स्मरण करो कि तुम कौन हो। इस प्रकार सभी महापुरुषों ने मन को उसके आधार से जोड़ने की बात कही।
आदिकाल में तरंगमय शब्द के द्वारा सृष्टि की संरचना हुई। तत्पश्चात यही शब्द हमारे प्राणतत्व में समा गया। अतः ब्रह्मज्ञान के द्वारा इस शब्द को जाग्रत कर देह के भीतर ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का साक्षात्कार किया जा सकता है।