मोहर्रम का चांद देखते ही शिया समुदाय के लोग करेंगे मजलिसों का आयोजन
इन्द्री विजय काम्बोज ||
अंजुमन यादगारें हुसैनी के संयोजक रजा अब्बास ने बताया कि मोहर्रम का चांद देखते ही शिया समुदाय के लोग गम में डूब जाते हैं और शोक मनाते हैं। शिया महिलाएं और लड़कियां इस दौरान अपने हाथों की चूडय़िां और जेवर उतार देती हैं और 2 महीने 8 दिनों तक शोक मनाती हैं और अपने इमाम को पुरसा देती हैं। उन्होंने कहा कि मोहर्रम त्यौहार नहीं बल्कि यह गम का महीना है। मोहर्रम हुसैनी मिशन को आगे बढऩे का नाम है। मोहर्रम हमें समाज में फैली हुई बुराइयों के खिलाफ उठ खड़े होना, जालिम के आगे सर ना झुकाना, इस्लाम की राह में सब कुछ कुर्बान कर देना, सच का साथ देना, इंसानियत की भलाई के लिए हर समय तैयार रहना आदि सबक सिखाता है। अबास ने कहा कि मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है जिसे मातम के रूप में मनाया जाता है। यह महीना मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की कर्बला में हुई शहादत की याद में मनाया जाता है। जैसे ही मोहर्रम का चांद नजर आते ही पूरी दुनिया में शिया समुदाय के लोग मजलिस और मातम करके अपने इमाम को पुरसा पेश करते हैं। इमाम हुसैन ने पूरी दुनिया को मोहब्बत, अमन और दहशतगर्दी के खिलाफ लडऩे का पैगाम दिया था। इमाम हुसैन सिर्फ एक कौम के नहीं थे। अंजुमन यादगारें हुसैनी के संयोजक रजा अब्बास ने बताया कि अब की बार सैयद छपरा में लोगों को पैगाम देने के लिए मौलाना जिनान असगर देहलवी शिरकत करेंगे।









