कृषि विज्ञान केंद्र में संपन्न हुआ 15 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम

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केंचुआ खाद पर 15 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन

साहा /अम्बाला (जयबीर राणा थंबड)
कृषि विज्ञान केंद्र, अम्बाला में वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. उपासना सिंह के दिशा-निर्देशन में 15 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो 25 जुलाई से 8 अगस्त तक आयोजित रहा। इस प्रशिक्षण का संचालन केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंह द्वारा किया गया। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को केंचुआ खाद की उपयोगिता, निर्माण की विधि एवं इसके कृषि में लाभ के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई। साथ ही, हाथों-हाथ (हैंड्स-ऑन) प्रशिक्षण के माध्यम से प्रतिभागियों को व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान किया गया। प्रशिक्षण के अंतर्गत प्रतिभागियों को कृषि विज्ञान केंद्र की वर्मी कम्पोस्ट यूनिट का भी भ्रमण कराया गया, ताकि वे इसके वास्तविक संचालन एवं संरचना को समझ सकें। प्रशिक्षण के दौरान बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति रही। बैंक के मुख्य प्रबंधक श्री सुधीर वर्मा ने कार्यक्रम में भाग लेकर किसानो को वित्तीय सहायता की जानकारी दिया।
मृदा की उर्वरता और स्वास्थ्य को सुधारने में केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट) एक प्रभावी और पर्यावरण–अनुकूल विकल्प के रूप में उभर रही है। डॉ राजेंद्र कुमार सिंह अनुसार, केंचुए खेतों की मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों को खाकर उन्हें छोटे-छोटे दानों में बदल देते हैं, जो पौधों के लिए पोषण का खजाना साबित होते हैं।
केंचुआ खाद में नाइट्रोजन (1.6%), फास्फोरस (0.7%), पोटाश (0.8%), कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और जिंक जैसे आवश्यक पोषक तत्व होते हैं, जो रासायनिक उर्वरकों का प्राकृतिक विकल्प प्रदान करते हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है, संरचना में सुधार होता है और जलनिकास स्वतः सुचारु रहता है।

डॉ सिंह बताते हैं कि जैविक खेती में अहम भूमिका वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन के लिए आइसिनिया फेटिडा और यूड्रिलस यूजिनी जैसी प्रजातियां अधिक उपयुक्त पाई गई हैं। ये केंचुए प्रतिदिन अपने वजन का पांच गुना कचरा खाते हैं और दो माह में उच्च गुणवत्ता वाली खाद तैयार कर देते हैं।केंचुओं के जीवन चक्र की खासियत है कि वे द्विलिंगी होते हैं, लेकिन निषेचन के लिए दो केंचुओं का मिलन जरूरी है। एक वयस्क केंचुआ 17 से 25 कोकून बनाता है, और एक कोकून से औसतन 3 केंचुए जन्म लेते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में एक वर्ष में इनकी संख्या हजारों गुना तक बढ़ सकती है। किसानों के लिए लाभदायक व्यवसाय केंचुआ खाद उत्पादन न केवल फसल की पैदावार बढ़ाता है, बल्कि यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय का भी जरिया है। डॉ अमित सिंह ने वर्मीकम्पोस्ट का नर्सरी में उपयोगिता पर प्रकाश डाला । डॉ सिंह का मानना है कि यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए बेहद लाभकारी व्यवसाय बन सकता है, क्योंकि इसकी मांग जैविक खेती, बागवानी और नर्सरी उद्योग में तेजी से बढ़ रही है।
डॉ विक्रम धीरेंद्र सिंह ने बायोफोर्टिफ़िकेशन के बारे में बताया। डॉ विक्रम सिंह का कहना है कि वर्मीकम्पोस्ट रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से हो रही मिट्टी की क्षति को रोकने का एक प्रभावी उपाय है। यह न केवल पर्यावरण–अनुकूल है, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खोलता है। डॉ राजन मिश्रा ने सभी को आवाहन किया कि पशु पालन बहुत आवश्यक है कृषि प्रणाली के लिए जो कि आज के समय में बहुत कम होता जा रहा है जो कि एक चिंता का विषय है। बिना पशु पालन के वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन संभव नहीं है। इस प्रशिक्षण में कुल 24 लोगो ने भाग लिया जिसमे से सभी का रुझान है आर्गेनिक खेती करने के लिए। आर्गेनिक शेयरिंग फाउंडेशन के संस्थापक श्री राहुल महाजन ने सभी प्रतिभागियों को फल के पौधे दिए एवं सबको साथ मिलकर काम करने के लिए प्रेरित किया। अंत में डॉ राजेंद्र सिंह ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया ।